Saturday, September 02, 2017

Parts of a horoscope कुण्डली के भाग

कैसे बनती है एक कुण्डली , जो पूर्व जन्म के कर्मो का लेखा जोखा होती है !!!

पंचांगः
ज्योतिष सिखने के लिए पंचांग का ज्ञान होना परम आवश्यक है।

पंचांग अर्थात जिसके पाँच अंग है तिथि, नक्षत्र, करण, योग, वार।

इन पाँच अंगो के माध्यम से ग्रहों की चाल
की गणना होती है।

तिथिः
कुल तिथियाँ 16 होती है,जो पंचांग में कृष्ण पक्ष व
शुकल पक्ष के अंतर्गत प्रदर्शित होती है,तिथियों के
नाम एकम् द्वितीया, तृतीया,
चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी,
सप्तमी, अष्टमी, नवमी,
दशमी, एकादशी, द्वाद्वशी,
त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावस्या और
पूर्णिमा है।

नक्षत्रः
नक्षत्रों की कुल संख्यां 27 होती
है,जिनके नाम इस प्रकार है
अंक नक्षत्र-नक्षत्रस्वामी पद(1,2,3,4)
1 अश्विनी-केतु (चु,चे,चो,ला)
2 भरणी-शुक्र (ली,लू,ले,ला)
3 कृत्तिका-सूर्य (अ,ई,उ,ए)
4 रोहिणी -चंद्र (ओ,वा,वी,वु)
5 मृगशीर्षा-मंगल (वे,वो,का,की)
6 आर्द्रा-राहु (कु,घ,ड.,छ)
7 पुनर्वसु-गुरु (के,को,हा,ही)
8 पुष्य-शनि (हु,हे,हो,ड)
9 अश्लेषा-बुध (डी,डू,डे,डो)
10 मघा-केतु (मा,मी,मू,मे)
11 पूर्बाफाल्गुनी-शुक्र (मो,टा,टी,टू)
12 उत्तरफाल्गुनी-सूर्य (टे,टे,पा,पी)
13 हस्त-चंद्र (पू,ष,ण,ठ)
14 चित्रा-मंगल (पे,पो,रा,री)
15 स्वाति-राहु (रू,रे,रो,ता)
16 विशाखा-गुरु (ती,तू,ते,तो)
17 अनुराधा-शनि (ना,नी,नू,ने)
18 ज्येष्ठा-बुध (नो,या,यी,यू)
19 मूला-केतु (ये,यो,भा,भी)
20 पूर्वाषाढ़ा-शुक्र (भू,धा,फा,ढा)
21 उत्तराषाढ़ा-सूर्य (भे,भो,जा,जी)
22 श्रवण-चंद्र (खी,खू,खे,खो)
23 धनष्ठा-मंगल (गा,गी,गु,गे)
24 शतभिषा-राहु (गो,सा,सी,सू)
25 पूर्वाभाद्रप्रद-गुरु (से,सो,दा,दी)
26 उत्तराभाद्रप्रद-शनि (दू,थ,झ,ञ)
27 रेवती-बुध (दे,दो,च,ची)
यदि 360 डिग्री को 27 से विभाजित किया जाए तो एक
नक्षत्र 13 डिग्री 20 अंश का होता है।

वारः अर्थात दिनों की संख्या सात है, सोमवार , मंगलवार
, बुधवार, वीरवार, शुक्रवार, शनिवार और रविवार।

करणः तिथि के आधे भाग को अर्थात आधी तिथि जितने
समय में बीतती हैं उसे करण कहते है
ये कुल 11 है, जिनके नाम बव, बालव, कौलव तेतिल, गर, वणिज,
विष्टि, शकुनि, चतुष्पद, नाग और किश्तुघ्न है।

योगः सूर्य तथा चन्द्र के राश्यांशो के योग से बनने वाले 27 प्रकार
के योग होते है, जिनके नाम विष्कुम्भ, प्रीति,
आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, अतिगण्ड, सिद्ध, सुकर्मा, धृति, शुल,
वृद्धि, धु्रव, व्याघात, हर्षण, वज्र, सिद्धि, व्यतिपात, वरियान,
परिघ, शिव, साध्य, शुभ, शुक्ल, ब्रह्म, ऐन्द्र, वैधृति
वैदिक ज्योतिष में मुख्यतः ग्रह व तारों के प्रभाव का अध्ययन
किया जाता है।

पृथ्वी सौर मंडल का एक तरह का
ग्रह है। इसके निवासियों पर सूर्य तथा सौर मंडल के ग्रहों का
प्रभाव पड़ता है, ऐसा ज्योतिष की मान्यता है।
पृथ्वी एक विशेष कक्षा में चलायमान है।
पृथ्वी पर रहने वालों को सूर्य इसी में
गतिशील नजर आता है। इस कक्षा के आसपास कुछ
तारों के समूह हैं, जिन्हें नक्षत्र कहा जाता है और
इन्हीं 27 तारा समूहों यानी नक्षत्रों से
12 राशियों का निर्माण हुआ है।

जिन्हें इस प्रकार जाना जाता है।
1-मेष, 2-वृष, 3-मिथुन, 4-कर्क, 5-सिंह, 6-कन्या, 7-तुला,
8-वृश्चिक, 9-धनु, 10-मकर, 11-कुंभ, 12-मीन।
प्रत्येक राशि 30 अंश की होती है।
पूर्ण राशिचक्र 360 अंश का होता है।

ग्रह लिंग विशोंतरी दशा(वर्ष)
सूर्य पुर्लिंग 6 वर्ष
चंद्र स्त्रीलिंग 10 वर्ष
मंगल पुर्लिंग 7 वर्ष
बुध नपुंसक 17 वर्ष
बृहस्पति पुर्लिंग 16 वर्ष
शुक्र स्त्रीलिंग 20 वर्ष
शनि पुर्लिंग 9 वर्ष
राहु पुर्लिंग 18 वर्ष
केतु पुर्लिंग 17 वर्षराहु एवं केतु वास्तविक ग्रह
नहीं हैं, इन्हें ज्योतिष शास्त्र में छायाग्रह माना
गया है।

राशियों का स्वभाव और उनका स्वामी...
राशि स्वभाव राशि स्वामी
मेष चर मंगल
वृषभ स्थिर शुक्र
मिथुन द्विस्वभाव बुध
कर्क चर चंद्र
सिंह स्थिर सूर्य
कन्या द्विस्वभाव बुध
तुला चर शुक्र
वृश्चिक स्थिर मंगल
धनु द्विस्वभाव गुरु
मकर चर शनि
कुंभ स्थिर शनि
मीन द्विस्वभाव गुरु

यदि 360 डिग्री को 12 से विभाजित किया जाए तो एक
राशि 30 डिग्री की होती है।

ग्रहो का कारकत्व

सूर्य - आत्मा ,पिता , मान-सम्मान ,प्रतिष्ठा ,नेत्र ,आरोग्यता
,प्रशासन ,मस्तिक , सुवर्ण ,गेंहू ,शक्ति मानक आदि लाल
वस्तुओं का कारक है

चंद्रमा - माता ,मन ,बुद्धि ,स्त्री ,धन ,चावल ,कपास
आदि श्वेत वस्त्र ,मोती, गला दाई आँख ,बाई आँख
,नाडी तंत्रादि

मंगल - पराक्रम , बल भूमि ,भाई , सेना , अग्नि ,गुड , मुंगा , ताम्र
,चोट , दुर्घटना आदि का कारक है

बुध - यह विद्या ,वाणी ,बुद्धि ,मित्र , सुख , मातुल
,बुध -बांधव ,गणित ,शिल्प ,ज्योतिष ,चाची
,मामी , हरिवस्त्र ,घृत, पन्ना रत्न आदि का कारक है

गुरु -यह विवेक ,बुद्धि ,मित्र , शरीर पुष्टि पुत्र
ज्ञान ,शास्त्र -धर्म ,बड़े भाई ,उदारता ,पुष्प -राग
,पीतवर्ण ,सुवर्ण ,ब्राह्मण ,मंत्री ,
सत्वगुण ,पति,सुख ,पौत्र,पितामह आदि का कारक है

शुक्र- आयु , वाहन ,आभूषणादि ,सांसारिक सुख ,व्यापार,कामसुख
,वीर्य ,चांदी,काव्य -रूचि
,संगीत ,श्वेत ,वस्त्र ,चांदी ,
हीरा,दुग्धादि पदार्थ का कारक है

शनि - आयु ,जीवन ,मुत्युकारक ,सेवक ,दुःख ,रोग
,विपति ,शिल्प ,भैंस, केश ,तिल ,तेल ,नीलम ,लोहाआदि
पदार्थो का कारक है

राहु -सर्प ,लाटरी ,गुप्त -धन ,भुत - बाधा,प्रयास
,तस्करी कम्बल,नारियल ,सप्तधान्य ,गुमेद आदि
पदार्थो का कारक है

केतु - यह गुप्त शक्ति ,कठिन कार्य ,दुख, धूम्ररंग ,अति
पीड़ा ,चर्मरोग ,व्रण, तन्त्र-विद्या,बकरी
,नीच जाती ,कुष्णवस्त्र ,कंबलादि, पदार्थो
का कारक है

जन्म कुंडली में यदि कोई कारक ग्रह शुभ भाव में
पड़ा हो या शुभ ग्रह द्वारा दृष्ट हो तो कारक ग्रह से संबंधित
सुख की प्राप्ति होगी। जब कोई ग्रह
अशुभ भाव में पड़ा हो अथवा पापी गृह से युक्त या
दुष्ट हो तो उस ग्रह के कारकत्व से संबंधित सुख में
कमी आएगी ।

द्वादश भावो द्वारा विचारणीय विषय
कुंडली में प्रत्येक भाव का अपना अपना महत्व होता
है। इन्ही द्वादश भावो में स्थिति राशियां एवं ग्रह
अपना शुभआशुभ फल प्रगट करते है।

द्वादश भावों में प्रत्येक
भाव में विचारणीय विषयो के संबंध में लिखा है

प्रथम भावः इस भाव में मुख्य रूप से जातक का
शारीरिक गठन ,स्वास्थय ,आयुपरमान,
शारीरिक रूप ,वर्ण, चिन्ह जाती ,स्वभाव
,गुण ,आकृति ,सुख दुखः ,शिर ,पितामह ,जन्म ,प्रारम्भिक
जीवन ,वर्तमान कालादि का विचार किया जाता है लग्न
एवं लग्नेश की स्थिति के बलाबलनुसार जातक स्वास्थ्य
स्वभाव तथा व्यक्तित्व का ज्ञान किया जाता है इस भाव में मिथुन
,कन्या ,तुला ,एवं कुंभ राशि बलवान मानी
जाती है इस भाव का कारक ग्रह सूर्य है।

द्वितीय भावः शरीर की रक्षा
के लिए धन अन्न ,वस्त्र द्रव्य एवं कुटुम्बदि साधनो
की आवश्यकता होती है। इस कारण धन
भाव भी कहते है। भाव से धन संग्रह ,परिवारिक
सुख ,मित्र ,विद्या ,खाद्य पदार्थ ,वस्त्र ,मुख ,दाहिनी
आँख ,नाक ,वाणी ,स्वर संगीत आदि कला
,विद्वता ,लेखन कला ,अर्जित धन ,सम्पति ,सुवर्णदि धातुओं का
क्रयविक्रय आदि का विचार किया जाता है।
द्वितीय भाव को मारक स्थान भी कहते
है इस भाव का कारक ग्रह ब्रहस्पति है।

तृतीय
भावः इस भाव से भाई बहनो का सुख ,सहोदर, पराक्रम ,नौकर-
चाकर ,साहस ,शौर्य, धैर्य, गायन ,भोगाभ्यास
,नजदीकी संबंधियो का सुख ,रेलयात्रा
,दाहिना कान ,हिम्मत ,सेना ,सेवक, माता पिता की मुत्यु
,चाचा ,मामा ,दमा ,खांसी, श्वास, भुजा, कर्ण आदि रोगो का
विचार किया जाता है।तीसरे भाव का कारक ग्रह मंगल
है।

चतुर्थ भावः इस भाव से सुख दुख ,माता ,स्थायी
सम्पति ,मकान ,जायदाद ,भूमि ,सवारी ,चैपाया, मित्र
बन्धु बांधव ,परोपकार के काम ,गृह खेत ,तालाब पानी
,नदी ,बाग ,बगीचा ,मामा ,श्वसुर
,नानी ,पेट , छाती ,आदि के रोग ,गृहस्थ्य
जीवन इस भाव से किया जाता है चंद्रमा व बुध ग्रह
इस स्थान के कारक है

पंचम भावः इस भाव से बुद्धि ,नीति, विद्या ,गर्भ ,संतान
से सुख दुख ,गुप्त मंत्र ,शास्त्र ज्ञान ,विद्धता ,मंत्र सिद्धि ,
विचार शक्ति ,लेखन कला ,लाटरी शेयर आदि आकास्मिक
धन लाभ या हानि ,यश अपयश का सुख प्रबन्धात्मक योग्यता
,पूर्वजन्म की स्थिति ,भविष्य ज्ञान ,आध्यात्मिक
रूचि ,मनोरंजन प्रेम संबंध ,इच्छाशक्ति ,जेठराग्नि ,गर्भाशय ,पेट
,मूत्रसह्यादि संबंधी विकारो का विचार पंचम भाव से
करते है। इस भाव का कारक ग्रह ब्रहस्पति है।

षष्ठ् भाव: इस भाव से शत्रु रोग ,ऋण ,चोरी या
दुर्घटना आदि की स्थिति ,दुष्टकर्म ,युद्ध ,अपयश
,मामा , मौसी ,सौतली माता से सुख दुख
,विश्वासघात ,पाप ,कर्म ,हानि ,शव बन्धुवर्ग से विरोध ,नाभि ,गुदा
स्थान , कमर ,संबंधी रोगो का विचार षष्ट भाव से करते
है शनि व मंगल भाव के कारक माने जाते है

सप्तम भावः इस भाव से स्त्री एवं विवाह सुख ,काम
वासना ,पति पत्नी संबंध ,साझेदारी के काम,
व्यापार में लाभ हानि वाद विवाद, मुकदमा ,कलह ,पितामह , प्रवास
,विदेश गमन ,भाई बहन की संतान ,लघु यात्राएं ,दैनिक
आय ,समझौता ,प्रत्येक शत्रु ,काम विकार ,बवासीर
वस्ति ,जननेन्द्रिय संबंध गुप्त रोगो का विचार किया जाता है इस
केंद्र भाव में वृश्चिक राशि बलवान होती है इसे मारक
स्थान भी कहते है इस भाव का कारक ग्रह शुक्र
है

अष्ट्म भावः इस भाव से मुत्यु के कारण ,आयु ,गुप्तधन
,की प्राप्ति ,विध्न ,पुरातत्व प्रेम ,समुद्रादि द्वारा
दीर्घ यात्राएं ,पूर्व जन्म की
जानकारी मृत्यु के बाद स्थिति, स्त्री से
भूमि धन आदि का लाभ दुर्घटना ,यातना ,गुदा , अंडकोष आदि
गुप्तेन्द्रिय संबंधी गुप्त रोगो एवं कष्टो ,पति या
पत्नी की आयु का मान ,ताऊ ,विघ्न ,दास्य
वर्ग एवं विषम परिस्थितियो का विचार अष्ट्म भाव से किया जाता है

नवम भाव: इस भाव से मानसिक वृति ,धर्म ,दान ,शील
,पुण्य ,तीर्थ यात्रा ,विद्या ,भाग्यो दय ,विदेश यात्रा
,मंत्र सिद्धि ,उत्तम विद्या ,बड़े भाई, पौत्र ,बहनोई ,भावजादि से
संबंध ,धार्मिक पुर्नजन्म प्रवृति संबंधी ज्ञान ,मंदिर
,गुरुद्वारा आदि धर्म स्थल गुरु भक्ति ,यश कीर्ति एवं
जंघा आदि विचार किया जाता है इस भाव का कारक ग्रह सूर्य व गुरु
है।

दशम भावः इस भाव को केंद्र एवं कर्म भाव भी कहते
है इस भाव से पिता का सुख दुख, अधिकार ,राज्य प्रतिष्ठा
,पदोन्नति ,नौकरी, व्यापार, विदेश गमन,
जीविका का साधन ,कार्य सिद्धि नेतृत्व ,सरकार ,सास
,वर्षा ,वायु यानादि, आकाशीय वृतांत एवं घुटनो आदि में
विकारो का दशम से देखा जाता है। दशमभाव में मेष, वृष, सिंह, धनु
(उत्तरार्ध),मकर राशि का पूर्वाद्ध बलवान होता है। दशम भाव के
कारक ग्रह सूर्य ,बुध गुरु ,एवं शनि है।

एकादश भाव: इस भाव से लाभ आय भाई ,मित्र जामाता (जमाई)
,ऐश्वर्य सम्पति ,मोटर -वाहन के सुख ,गुप्तधन, बड़े भाई या
बड़ी बहन ,दांया कान , मांगलिक कार्य, ऐश्वर्य
की वस्तु ,द्वितीय पत्नी एवं
पिंडलियों का विचार 11वें भाव से करते है। इस भाव का कारकग्रह
गुरू है।

दादश भाव: इसको व्यय स्थान व्यय स्थान भी कहते
है इस भाव से धन हानि ,खर्च ,दान ,दंड व्यसन ,रोग, शत्रु
पक्ष से हानि, बाहरी स्थानो से संबंधित नेत्र
पीड़ा, फजूल खर्च ,स्त्री पुरुष, गुप्त
सम्बन्ध, शयन सुख , दुख -पीड़ा बंधन (जेलादि)
,मृत्यु के बाद प्राणी की गति मोक्ष ,कर्ज,
षड्यंत्र ,धोखा ,राजकीय संकट ,शरीर में
पाँव एवं तलुवों आदि का विचार किया जाता है। इस भाव का कारक ग्रह शनि है।

इसके इलावा जातक की जन्म
कुंडली में और भी कुंडलिया
होती है ये वर्गीय कुंडलिया लग्न
कुंडली का विस्तार होती है इन से
भी जातक के जीवन का फलित किया जाता
है इनके नाम इस प्रकार है लग्न कुंडली ,चन्द्र
कुंडली ,सूर्य कुंडली ,होरा
कुंडली , द्रेष्काण कुंडली ,चतुर्थांश
कुंडली , पंचमांश कुंडली , षष्ठांश
कुंडली , सप्तमांश कुंडली , अष्ठमांश
कुंडली , नवमांश कुंडली , दशमांश
कुंडली , एकादशांश कुंडली , द्वादशांश
कुंडली , षोडशांश कुंडली , विशांश
कुंडली , चतुर्विशांश कुंडली , सप्तविशांश
कुंडली , त्रिशांश कुंडली , खवेदांश
कुंडली , अक्ष्वेदांश कुंडली , षष्टयंश
कुंडली के इलावा पाद, उपपाद, मुंथादि का विचार किया जाता
है।

Friday, September 01, 2017

We are all connected in universe

एक चूहा एक व्यापारी के घर में बिल बना कर रहता था. एक दिन चूहे  ने देखा कि उस व्यापारी ने और उसकी पत्नी एक थैले से कुछ निकाल रहे हैं. चूहे  ने सोचा कि शायद कुछ खाने का सामान है.
उत्सुकतावश देखने पर उसने पाया कि वो एक चूहेदानी थी. ख़तरा भाँपने पर उस ने पिछवाड़े में जा कर कबूतर  को यह बात बताई कि घर में चूहेदानी आ गयी है.
कबूतर ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि मुझे क्या? मुझे कौनसा उस में फँसना है?
निराश चूहा ये बात मुर्गे को बताने गया.
मुर्गे ने खिल्ली उड़ाते हुए कहा… जा भाई..ये मेरी समस्या नहीं है.
हताश चूहे ने बाड़े में जा कर बकरे को ये बात बताई… और बकरा हँसते हँसते लोटपोट होने लगा
.
उसी रात चूहेदानी में खटाक की आवाज़ हुई जिस में एक ज़हरीला साँप फँस गया था.
अँधेरे में उसकी पूँछ को चूहा समझ कर उस व्यापारी की पत्नी ने उसे निकाला और साँप ने उसे डंस लिया.
तबीयत बिगड़ने पर उस व्यक्ति ने वैद्य को बुलवाया. वैद्य ने उसे कबूतर  का सूप पिलाने की सलाह दी.
कबूतर अब पतीले में उबल रहा था ।
खबर सुनकर उस व्यापारी के कई रिश्तेदार मिलने आ पहुँचे जिनके भोजन प्रबंध हेतु अगले दिन मुर्गे को काटा गया.
कुछ दिनों बाद उस व्यापारी की पत्नी सही हो गयी… तो खुशी में उस व्यक्ति ने कुछ अपने शुभचिंतकों के लिए एक दावत रखी तो बकरे  को काटा गया..
चूहा दूर जा चुका था…बहुत दूर ……….

अगली बार कोई आप को अपनी समस्या बातये और आप को लगे कि ये मेरी समस्या नहीं है तो रुकिए और दुबारा सोचिये….

समाज का एक अंग, एक तबका, एक नागरिक खतरे में है तो पूरा देश खतरे में है…

अपने-अपने दायरे से बाहर निकलिये.
स्वयंम तक सीमित मत रहिये. .
समाजिक बनिये…
और राष्ट्र धर्म के लिए एक बनें..

Om Sai Ram

Ganpati visarjan muhurat 2017 गणपति विसर्जन का शुभ मुहूर्त

जाने गणपति विसर्जन का शुभ मुहूर्त

गणेश चतुर्थी का पर्व 5 सितंबर तक चलेगा।
विसर्जन का सुबह का मुहूर्त- 09:32 बजे- 14:11 अपराह्न तक।

दोपहर का मुहूर्त(शुभ) = 15: 44 बजे- 17:17 बजे तक।

शाम का मुहूर्त(प्रयोग) = 20:17 अपराह्न - 21: 44 बजे तक।

रात का मुहूर्त = 23:11 बजे तक।

जलझूलनी एकादशी washing Krishna's clothes

जलझूलनी एकादशी है।
      ***************
क्यों और कब मनती हैं डोल ग्यारस :-
 
डोल ग्यारस पर्व भादौ मास के शुक्ल पक्ष के 11वें दिन मनाया जाता है। कृष्ण जन्म के 11वें दिन माता यशोदा ने उनका जलवा पूजन किया था।

इसी दिन को 'डोल ग्यारस' के रूप मे मनाया जाता है, आगे-

ग्यारस हिन्दू धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसारभाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की   एकादशी को कहा जाता है।

इस दिन भगवान विष्णु करवट
बदलते हैं, इसीलिए यह 'परिवर्तनी एकादशी' भी कही जाती है। इसके अतिरिक्त यह एकादशी 'पद्मा एकादशी' और 'जलझूलनी एकादशी' के नाम से भी जानी जाती है। इस तिथि को व्रत करने से वाजपेय यज्ञका फल
        मिलता है।
महत्त्व
****
इस तिथि पर भगवान विष्णु के वामन अवतार कि पूजा की जाती है। इस व्रत को करने से व्यक्ति के सुख, सौभाग्य में बढोतरी होती है। डोल ग्यारस के विषय में एक मान्यता है कि इस दिन माता यशोदा ने भगवान श्रीकृष्ण के वस्त्र धोये थे। इसी कारण से इस एकादशी को 'जलझूलनी एकादशी' भी कहा जाता है। मंदिरों में इस दिन भगवान विष्णु को पालकी में बिठाकर शोभा यात्रा निकाली जाती है। भगवान विष्णु की प्रतिमा को स्नान कराया जाता है। इस अवसर पर भगवान के दर्शन करने के लिये लोग सैलाब की तरह उमड़ पड़ते हैं। इस एकादशी के दिन व्रत कर भगवान विष्णु की पूजा की जाती है।
लाभ-
इस तिथि को व्रत करने से वाजपेय यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है। पापियों के पाप नाश के लिए इससे बढ़कर कोई उपाय नहीं है। जो मनुष्य इस  एकादशी को भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा करता है, उससे तीनों लोक पूज्य होते हैं। इस व्रत के बारे में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं युधिष्ठिर से कहा है कि- "जो इस दिन कमल नयन भगवान का कमल से पूजन करते हैं, वे अवश्य भगवान के समीप जाते हैं। जिसने भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की एकादशी को व्रत और पूजन किया,उसने ब्रह्मा, विष्णु,
 सहित तीनों लोकों का पूजन किया। अत: हरिवासर अर्थात एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए।" इस दिन भगवान करवट लेते हैं, इसलिए इसको 'परिवर्तिनी एकादशी' भी कहा जाता है।

         !! जय श्री कृष्ण !!

Tuesday, July 25, 2017

VEDIC RAKHI वैदिक रक्षासूत्र*


VEDIC RAKHI*     
             
वैदिक रक्षासूत्र*

*रक्षासूत्र मात्र एक धागा नहीं बल्कि शुभ भावनाओं व शुभ संकल्पों का पुलिंदा है । यही सूत्र जब वैदिक रीति से बनाया जाता है और भगवन्नाम व भगवद्भाव सहित शुभ संकल्प करके बाँधा जाता है तो इसका सामर्थ्य असीम हो जाता है

कैसे बनायें वैदिक राखी *

*💮वैदिक राखी बनाने के लिए एक छोटा-सा ऊनी, सूती या रेशमी पीले कपड़े का टुकड़ा लें । उसमें💮*

*🍃(१) दूर्वा*

*🍃(२) अक्षत (साबूत चावल)*

*🍃(३) केसर या हल्दी*

*🍃(४) शुद्ध चंदन*

*🍃(५) सरसों के साबूत दाने*

*💮इन पाँच चीजों को मिलाकर कपड़े में बाँधकर सिलाई कर दें । फिर कलावे से जोड़कर राखी का आकार दें । सामर्थ्य हो तो उपरोक्त पाँच वस्तुओं के साथ स्वर्ण भी डाल सकते हैं ।💮*

*📿वैदिक राखी का महत्त्व📿*

*💮वैदिक राखी में डाली जानेवाली वस्तुएँ हमारे जीवन को उन्नति की ओर ले जानेवाले संकल्पों को पोषित करती हैं ।💮*

*🎋(१) दूर्वा*
*🏵जैसे दूर्वा का एक अंकुर जमीन में लगाने पर वह हजारों की संख्या में फैल जाती है, वैसे ही ‘हमारे भाई या हितैषी के जीवन में भी सद्गुण फैलते जायें, बढ़ते जायें...’ इस भावना का द्योतक है दूर्वा । दूर्वा गणेशजी की प्रिय है अर्थात् हम जिनको राखी बाँध रहे हैं उनके जीवन में आनेवाले विघ्नों का नाश हो जाय ।*

*🎋(२) अक्षत (साबूत चावल)*
*🏵हमारी भक्ति और श्रद्धा भगवान के, गुरु के चरणों में अक्षत हो, अखंड और अटूट हो, कभी क्षत-विक्षत न हो - यह अक्षत का संकेत है । अक्षत पूर्णता की भावना के प्रतीक हैं । जो कुछ अर्पित किया जाय, पूरी भावना के साथ किया जाय ।*

*🎋(३) केसर या हल्दी*
*🏵केसरकेसर की प्रकृति तेज होती है अर्थात् हम जिनको यह रक्षासूत्र बाँध रहे हैं उनका जीवन तेजस्वी हो । उनका आध्यात्मिक तेज, भक्ति और ज्ञान का तेज बढ़ता जाय । केसर की जगह पिसी हल्दी का भी प्रयोग कर सकते हैं । हल्दी पवित्रता व शुभ का प्रतीक है । यह नजरदोष व नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करती है तथा उत्तम स्वास्थ्य व सम्पन्नता लाती है ।*

*🎋(४) चंदन*
*🏵चंदनचंदन दूसरों को शीतलता और सुगंध देता है । यह इस भावना का द्योतक है कि जिनको हम राखी बाँध रहे हैं, उनके जीवन में सदैव शीतलता बनी रहे, कभी तनाव न हो । उनके द्वारा दूसरों को पवित्रता, सज्जनता व संयम आदि की सुगंध मिलती रहे । उनकी सेवा-सुवास दूर तक फैले ।*

*🎋(५) सरसों*
*🏵सरसोंसरसों तीक्ष्ण होती है । इसी प्रकार हम अपने दुर्गुणों का विनाश करने में, समाज-द्रोहियों को सबक सिखाने में तीक्ष्ण बनें ।*

*💮अतः यह वैदिक रक्षासूत्र वैदिक संकल्पों से परिपूर्ण होकर सर्व-मंगलकारी है । यह रक्षासूत्र बाँधते समय यह श्लोक बोला जाता है :💮*

*🍃येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः ।*
*🍃तेन त्वां अभिबध्नामि१ रक्षे मा चल मा चल ।।*

*🍃इस मंत्रोच्चारण व शुभ संकल्प सहित वैदिक राखी बहन अपने भाई को, माँ अपने बेटे को, दादी अपने पोते को बाँध सकती है । यही नहीं, शिष्य भी यदि इस वैदिक राखी को अपने सद्गुरु को प्रेमसहित अर्पण करता है तो उसकी सब अमंगलों से रक्षा होती है  भक्ति बढ़ती है
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

Saturday, July 22, 2017

श्रवण मॉस में दिन अनुसार शिव पूजा का फल

श्रावण मॉस में दिन अनुसार शिव पूजा का फल- 🙏🙏

रविवार-   पाप नाशक 
सोमवार-  धन लाभ 
मंगलवार- स्वस्थ्य लाभ, रोग निवारण 
बुधवार-    पुत्र प्राप्ति 
गुरूवार-   आयु कारक
शुक्रवार-   इन्द्रिय सुख 
शनिवार-   सर्व सुखकारी 

श्रावण मॉस में शिव पूजा हेतु शास्त्रोक्त उत्तम स्थान-

तुलसी, पीपल व वट वृक्ष के समीप , नदी, सरोवर का तट, पर्वत की चोटी, सागर तीर , मंदिर, आश्रम, तीर्थ अथवा धार्मिक स्थल, पावन धाम, गुरु की शरण में

शिव पूजा व पुष्प 

बिल्वपत्र- जन्म जन्मान्तर के पापो से मुक्ति
           (पूर्व जन्म के पाप आदि) 
कमल-      मुक्ति, धन, शांति प्रदायक 
कुशा-        मुक्ति प्रदायक 
दूर्वा-         आयु प्रदायक 
धतूरा-        पुत्र सुख प्रदायक 
आक-         प्रताप वृद्धि 
कनेर-         रोग निवारक 
श्रंघार पुष्प- संपदा वर्धक 
शमी पत्र-    पाप नाशक 

शिव अभिषेक व पूजा में प्रयुक्त द्रव्य विशेष के फल- 

मधु-              सिद्धि प्रद
दुग्ध से-          समृद्धि दायक 
कुषा जल-       रोग नाशक 
ईख रस-          मंगल कारक 
गंगा जल-        सर्व सिद्धि दायक 
ऋतू फल के रस- धन लाभ 

शिव आराधना के मंत्र व अनुष्ठान-

|| नमोस्तुते शंकरशांतिमूर्ति | नमोस्तुते चन्द्रकलावत्स ||
|| नमोस्तुते कारण कारणाय | नमोस्तुते कर्भ वर्जिताय ||

अथवा 

|| ॐ नमस्तुते देवेशाय नमस्कृताय भूत भव्य महादेवाय हरित पिंगल लोचनाय ||

अथवा 

|| ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः ||

अथवा 

|| ॐ दक्षिणा मूर्ति शिवाय नमः ||

अथवा 

|| ॐ दारिद्र्य दुःख दहनाय नम: शिवाय ||

अथवा 

|| वृषवाहनः शिव शंकराय नमो नमः |
ओजस्तेजो सर्वशासकः शिव शंकराय नमो नमः ||

अदरक के लाभ benefits of ginger herb और प्राचीन काल में प्रयोग

-अदरक का प्राचीन काल में प्रयोग--*

ऐतिहासिक अभिलेखों से भी पहले से भारत और चीन में अदरक को एक मसाले और औषधि के रूप में उपजाया और इस्तेमाल किया जाता था।
दोनों देशों के शुरुआती चिकित्सा ग्रंथों में ताजे और सुखाए गए, दोनों रूपों में इस मसाले के औषधीय इस्तेमाल का विस्तार से वर्णन है।
चौथी शताब्दी ईसापूर्व के चीनी ग्रंथों में अदरक को पेट की समस्याओं, मतली, दस्त, हैजा, दांतदर्द, रक्तस्राव और गठिया के उपचार के लिए एक औषधि के रूप में बताया गया है।
चीन के जड़ी-बूटी विशेषज्ञ इस बूटी का इस्तेमाल सर्दी-खांसी सहित तमाम श्वास संबंधी बीमारियों के उपचार में भी करते हैं।
पांचवीं सदी में चीनी नाविक लंबी समुद्री यात्राओं में स्कर्वी के इलाज के लिए अदरक में मौजूद विटामिन सी तत्वों का इस्तेमाल करते थे।
भारत के आयुर्वेदिक ग्रंथों में अदरक को सबसे महत्वपूर्ण बूटियों में से एक माना गया है।
यहां तक कि उसे अपने आप में औषधियों का पूरा खजाना बताया गया है। 
आयुर्वेदिक चिकित्सक इसको एक शक्तिशाली पाचक के रूप में लेने की सलाह देते हैं क्योंकि यह पाचक अग्नि को भड़काता है और भूख बढ़ाती है। इसके पोषक तत्व शरीर के सभी हिस्सों तक आसानी से पहुंच पाते हैं।
आयुर्वेद में अदरक को जोड़ों के दर्द, मतली और गति के कारण होने वाली परेशानी के उपचार में भी इस्तेमाल किया जाता है।--अदरक से सावधानी--*

अदरक का ज्यादा सेवन कई बार सीने में जलन की समस्या की वजह बन सकता है।
जहां डायरिया में लाभकारी है वही ज्यादा इस्तेमाल डायरिया बढ़ा भी सकता है।
अदरक की तासीर गरम होती है इसलिए कई बार माहवारी में ज्यादा ब्लीडिंग होने की परेशानी हो सकती है।

अदरक कई बार त्वचा पर इरिटेशन की वजह भी बन सकता है।

ऐसा भी कहा जाता है कि प्रेग्नेंसी में अदरक के इस्तेमाल से फीटल के सेक्स हार्मोन प्रभावित होते हैं। कई बार मिसकैरिज भी हो सकता है।

अदरक का सेवन ब्लड शुगर को लो कर सकता है जिससे डायबिटीज की समस्या हो सकती है।

अदरक की हाई डोज़ दिल की कुछ समस्याओं को और भी बढ़ा सकती है।

ब्रेस्ट फीडिंग कराने वाली महिलाओं को भी अदरक का सेवन नहीं करना चाहिए।

बवासीर की तकलीफ वालों को अदरक का सेवन कम करना चाहिए। बेड टी में अदरक ऐसे लोगों की परेशानी बढ़ा सकती है।

गर्मी के दिनों में अदरक का ज्यादा सेवन नुकसान कर सकता है।

खून की उल्टी में अदरक का इस्तेमाल बिलकुल न करें।
*--अदरक में पाए जाने वाले पोषक तत्व--*

अदरक में बहुत से औषधीय गुण(medicinal properties) पाए जाते है| अदरक के सेवन से बहुत से रोगों से मुक्ति मिलती है|
अदरकमें 80 प्रतिशत जल पाया जाता है|
जबकि सोंठ(सूखी अदरक) में लगभग 10 प्रतिशत ही जल पाया जाता है|
इसके अलावा इसमें 53 प्रतिशत स्टार्च, 12.4 प्रतिशत प्रोटीन, 7.2 प्रतिशत फाइबर, 6.6 राख, 1.8 प्रतिशत तात्विक तेल(essential oil) पाया जाता है और इसमें नाइट्रोजन, एमिनो एसिड, ग्लूकोज, सुक्रोस, फ्रक्टोज, सुगन्धित तेल, ओलियोरेसिन, जिन्जिवरीन, रैफीनीस, कैल्शियम, विटामिन B और C, प्रोतिथीलिट एंजायम, औथियोरेजिन और लौह(आयरन) तत्व पाया जाता है|
--भूख बढ़ाने के लिए--*

अदरक का नियमित सेवन करने से भूख न लगने की समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है।
अगर आपको भूख कम लगती हैं तो अदरक को बारीक काटकर, थोड़ा सा नमक लगाकर दिन में एक बार लगातार आठ दिन तक खाइए।
इससे पेट साफ होगा और ज्यादा भूख लगेगी
-अदरक एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट है--*

दुनिया में हुए बहुत से अध्ययनों में पाया गया है कि अदरक में शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट होते हैं जो लिपिड पेरोक्सिडेशन और डीएनए क्षति को रोकती है।

एंटीऑक्सीडेंट बहुत ही महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि वे फ्री रेडिकल्स के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करते हैं। इससे उम्र के साथ आने वाली तमाम तरह की बीमारियों जैसे कैंसर, हृदय रोग, मधुमेह, आर्थराइटिस, अल्जाइमर्स और बाकी रोगों से बचाव में मदद मिलती है।

हालांकि सभी मसालों में शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं, अदरक उनमें ज्यादा प्रभावशाली है। इसमें अपनी 25 अलग-अलग एंटीऑक्सीडेंट विशेषताएं हैं। इसके कारण यह शरीर के अलग-अलग हिस्सों में तमाम तरह के फ्री रेडिकल्स से लड़ने में बहुत असरदार है।
--त्वचा को आकर्षित बनाने के लिए--*

अदरक के सेवन से त्वचा आकर्षित और चमकदार बनती है।
अगर आप भी अपनी त्वचा को आकर्षित बनाना चाहते हैं तो  सुबह खाली पेट एक गिलास गुनगुने पानी के साथ अदरक का एक टुकड़ा जरूर खाएं।
इससे न केवल आपकी त्वचा में निखार आएगा बल्कि आप लंबे समय तक जवां दिखेंगे
--कोलेस्ट्राल में फायदेमंद--*

अदरक का प्रयोग हमारे कोलेस्ट्रोल को भी कंट्रोल करता है, इससे ब्लड सर्कुलेशन ठीक रहता है और इसके इस्तेमाल से खून में क्लाट नहीं बनते साथ ही इसमें एंटी फंगल और कैंसर प्रतिरोधी होने के गुण भी पाए जाते हैं।

Thursday, July 06, 2017

भगवान शिव को कौन सी चीज़ चढाने से मिलता है क्या फल

शिवजी की पूजा में ध्यान रखने योग्य बात

शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव को कौन सी चीज़ चढाने से
मिलता है क्या फल

किसी भी देवी-देवता का पूजन करते वक़्त उनको अनेक चीज़ें
अर्पित की जाती है। प्रायः भगवन को अर्पित की जाने वाली हर
चीज़ का फल अलग होता है। शिव पुराण में इस बात का वर्णन
मिलता है की भगवन शिव को अर्पित करने वाली अलग-अलग
चीज़ों का क्या फल होता है।
..                  🌹अनाज🌹

शिवपुराण के अनुसार जानिए कौन सा अनाज भगवान शिव को
चढ़ाने से क्या फल मिलता है

   1. भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है।
   2. तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाता है।
   3. जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है।
   4. गेहूं चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है।यह सभी अन्न भगवान.
..                  🌷 द्रव्य 🌷

को अर्पण करने के बाद गरीबों में वितरीत कर देना चाहिए।
शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन सा रस
(द्रव्य) चढ़ाने से उसका क्या फल मिलता है
  1. ज्वर (बुखार) होने पर भगवान शिव को जलधारा चढ़ाने से
शीघ्र लाभ मिलता है। सुख व संतान की वृद्धि के लिए भी
जलधारा द्वारा शिव की पूजा उत्तम बताई गई है।
   2. नपुंसक व्यक्ति अगर शुद्ध घी से भगवान शिव का अभिषेक
करे, ब्राह्मणों को भोजन कराए तथा सोमवार का व्रत करे तो
उसकी समस्या का निदान संभव है।
  3. तेज दिमाग के लिए शक्कर मिश्रित दूध भगवान शिव को
चढ़ाएं।
   4. सुगंधित तेल से भगवान शिव का अभिषेक करने पर समृद्धि में
वृद्धि होती है।
   5. शिवलिंग पर ईख (गन्ना) का रस चढ़ाया जाए तो सभी आनंदों
की प्राप्ति होती है।
   6. शिव को गंगाजल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति
होती है।
  '7. मधु (शहद) से भगवान शिव का अभिषेक करने से राजयक्ष्मा
(टीबी) रोग में आराम मिलता है।-   
                  🌸 फूल 🌸

शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन का फूल
चढ़ाया जाए तो उसका क्या फल मिलता है
   1. लाल व सफेद आंकड़े के फूल से भगवान शिव का पूजन करने
पर भोग व मोक्ष की प्राप्ति होती है।
   2. चमेली के फूल से पूजन करने पर वाहन सुख मिलता है।
   3. अलसी के फूलों से शिव का पूजन करने से मनुष्य भगवान
विष्णु को प्रिय होता है।
   4. शमी पत्रों (पत्तों) से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है।
5. बेला के फूल से पूजन करने पर सुंदर व सुशील पत्नी मिलती
है।
   6. जूही के फूल से शिव का पूजन करें तो घर में कभी अन्न की
कमी नहीं होती।
  '7. कनेर के फूलों से शिव पूजन करने से नए वस्त्र मिलते हैं।
   8. हरसिंगार के फूलों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति में वृद्धि
होती है।
   9. धतूरे के फूल से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र
प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशनकरता है।
   10. लाल डंठलवाला धतूरा पूजन में शुभ माना गया है।
   11. दूर्वा से पूजन करने पर आयु बढ़ती है....!!
    

Wednesday, June 28, 2017

किस पेड़ की पूजा से मिलता है क्या फायदा

*किस पेड़ की पूजा से मिलता है क्या फायदा*

किस पेड़ की पूजा से मिलता है क्या फायदा

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुछ विशेष पेड़-पौधों की पूजा करने से हमारी कुंडली के दोष तो दूर होते ही हैं साथ ही जीवन की अनेक परेशानियों से छुटकारा भी मिल सकता है। आइये जानते है किन पेड़-पौधों की पूजा से हमें क्या फायदा हो सकता है।

तुलसी – जिस घर में रोज़ तुलसी के पौधे की पूजा होती है, देवी लक्ष्मी उस घर को छोड़कर कहीं नहीं जाती। वहां हमेशा सुख-समृधि बनी रहती है।

पीपल – हिन्दू धर्म में पीपल को पूजनीय वृक्ष माना गया है। इसकी पूजा करने से शनि दोष से मुक्ति मिलती है, साथ ही भगवान विष्णु की कृपा भी प्राप्त होती है।

नीम – इसकी पूजा करने से कुंडली के सभी दोष दूर होते हैं व रोगों से छुटकारा भी मिलता है। परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।

बरगद – इसे बड़ व वट वृक्ष भी कहते है। इसकी पूजा से महिलाओं का सौभाग्य अखंड रहता हैं व संतान संबंधी समस्याएं भी दूर होती है। ये बहुत ही पवित्र पेड़ है।

आंवला – इस पेड़ की पूजा से देवी लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और पूजा करने वाले को धन संबंधी कोई समस्या नहीं होती। उसे हर क्षेत्र में सफलता मिलती है।

बिल्व – इस पेड़ के पत्ते व फल भगवान शिव को अर्पित किए जाते हैं। इसकी पूजा से नौकरी में प्रमोशन के योग बनते हैं व अकाल मृत्यु से रक्षा होती हैं।

अशोक – इस की पूजा से सभी प्रकार के रोग-शोक दूर होते हैं व पारिवारिक जीवन सुखी होता है। किसी विशेष कामना पूर्ति के लिए भी इसकी पूजा की जाती है।

केला – जिन लोगों की कुंडली में गुरु संबंधित दोष होते हैं, वे यदि इस पेड़ की पूजा करें तो उन्हें लाभ होता है। इसकी पूजा से विवाह के योग भी शीघ्र बनते हैं।

शमी – इस पेड़ की पूजा से शत्रुओं पर विजय मिलती हैं व कोर्ट केस में सफलता मिलने के योग बनते हैं। दशहरे पर इसकी विशेष पूजा की जाती है।

लाल चन्दन – सूर्य से संबंधित गृह दोष दूर करने के लिए लाल चंदन के पेड़ की पूजा विधि-विधान से करनी चाहिए। इससे प्रमोशन होने के योग भी बनते हैं।

Friday, June 16, 2017

Recall dream to make life powerful

I had mentioned a few days back on posting about tips to improve dream re call. Once again all of us dream. But our ability to remember and recall our dream fades over a period of time or isnt really developed. Here are some simple tips to help you remember your dreams. (Dreams are important messengers and bring valuable guidance and healing. More so, dreams are free tools available to us for healing. So those of you who feel, you cant afford healing sessions or workshops, learn how to harness the power of your dreams and start working with this wonderful night time oracle.

Few of the many tips to improve dream re call :-

(1) Before going to bed, set the intention to remember your dreams.
(2) Avoid using an alarm clock. Train your body to wake you up instead. The sound of the alarm clock can abrupt the dream process
(3) Set an intention for the night (what you want to dream about - want some guidance, need a healing or just visit some places or have fun)
(4)Having set your intention, make sure you have the means to honor it. Keep pen and paper (or a tape recorder) next to our bed so you are ready to record something when you wake up
(5)If you still don’t have a dream, write something down anyway: whatever is in your awareness, including feelings and physical sensations. You are catching the residue of a dream even if the dream itself is gone. And as you do this, you are saying to the source of our dreams, “I’m listening. Talk to me.”

Keep Dreaming !!

Ref: Ms Nanwani